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Friday, December 23, 2016

श्रीगणितम्गीता

रामानुजन - गाथा और गणित चालीसा लिखने के बाद श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर मन में विचार आया - क्यों न श्रीगणितम्गीता लिखा जाए. यह विचार अभी प्रस्तावित है. इसके लिए कुछ संस्कृत शब्दों को सीख रहा हूँ. साथ ही पात्र और प्रसंग के विषय में सोच रहा हूँ. इसके लिए एक प्रसंग का ध्यान कुछ इस प्रकार आया है:
दो अलग - अलग परिवार के लोग (अभी पांडु और कुरु ही मान लीजिए ) अपने - अपने सम्मान की रक्षा के लिए बच्चों (अभी पांडव और कौरव ही मान लीजिए) को गणित पढ़ाना चाहते हैं. बच्चे भी मान जाते हैं. परन्तु विद्यालय पहुँचकर एक बच्चे (अभी अर्जुन ही मान लीजिए) का मन भटक जाता है. तब शिक्षक (अभी कृष्ण ही मान लीजिए) इस प्रकार उपदेश देते हैं:

धृतराष्ट्र उवाच

ज्ञानक्षेत्रे विद्यालये समवेता गणितेच्छवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥

(भावार्थ : धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! ज्ञानभूमि विद्यालय के प्रांगन में एकत्रित, गणित पढ़ने की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?)

अर्जुन उवाच

बहुविध विज्ञानम् वाणिज्यम् साहित्यस्तथैव च कलाः ।
दर्शनम् राजनीतिशास्त्रश्च किंकिम नास्ति सरस विषयाः॥

(भावार्थ : अर्जुन बोले - विज्ञान, वाणिज्य, साहित्य और कई प्रकार की कलाएँ हैं. दर्शन, राजनीतिशास्त्र और न जाने कौन - कौन से सरस विषय हैं. )

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यस्य सुखस्य हेतोः किं नु गणितस्य कृते ॥

(भावार्थ : हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के सुख के लिए भी मैं इन सब (विषयों को पढ़ने की) इच्छा को मारना नहीं चाहता, फिर गणित के लिए तो कहना ही क्या है?)

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः विद्यालये कक्षोपस्थ उपाविशत्‌ ।
विसृज्य गणितस्य पुस्तकञ्च शोकसंविग्नमानसः ॥

(भावार्थ : संजय बोले- विद्यालय प्रांगन में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, गणित के पुस्तक को त्यागकर कक्षा के पिछले भाग में बैठ गए.)

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌ ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥

(भावार्थ : श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है.)

यदा यदा हि गणितस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमगणितस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

(भावार्थ : हे भारत! जब-जब गणित की हानि और अगणित की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से छात्रों के सम्मुख प्रकट होता हूँ)

परित्राणाय गणितज्ञानाम् विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
गणितसंस्थापनार्थाय (रामानुजनसदृशे) सम्भवामि युगे युगे ॥

(भावार्थ : गणितज्ञों का उद्धार करने के लिए, दुष्टों का विनाश करने के लिए और गणित की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं ही (रामानुजन के रूप में) युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ.)

श्रीभगवानुवाच


तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वाज्ञानं पठतु गणितं समृद्धम्‌ ।
मयैवैते प्रमेयाः सिद्धाः अन्वेषिताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥

(भावार्थ : अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और अज्ञान को जीतकर समृद्ध गणित पढ़। ये सभी प्रमेय पहले ही से मेरे ही द्वारा खोजे और सिद्ध किए जा चुके हैं. हे सव्यसाचिन ! (बाएँ हाथ से भी कुशलता पूर्वक कार्य कर लेने वाला) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा.)

© राज कुमार मिस्त्री

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