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Monday, December 26, 2016

क्या मैं विज्ञान जानता हूँ या विज्ञान में विश्वास करता हूँ ?

इस पर कोई टिप्पणी करने से पहले यह जान लेना आवश्यक है कि विज्ञान सदैव सत्य नहीं बताता है. इससे हमें यह नहीं समझना चाहिए कि विज्ञान असत्य भी बताता है. वास्तव में विज्ञान सत्य की खोज के लिए एक व्यवस्थित विधि का प्रयोग करता है जिसके अंतर्गत प्रेक्षण, प्रयोग और विश्लेषण के द्वारा किसी वास्तविकता की व्याख्या करने की कोशिश की जाती है और वैज्ञानिक सिद्धांतों का प्रतिपादन किया जाता है. लेकिन ये सिद्धांत इस बात पर निर्भर करते हैं कि हमारा प्रेक्षण, प्रयोग और विश्लेषण किस हद तक सही है. यह हमारे चिंतन और किसी वस्तु या घटना के विविध पक्षों को देखने की क्षमता पर निर्भर करता है. अतः कोई सिद्धांत, जो आज सत्य प्रतीत होता है, हो सकता है भविष्य में उसमें कुछ परिवर्तन करना पड़े या उसे असत्य प्रमाणित कर दिया जाए.
अब मूल प्रश्न पर. जानने से क्या तात्पर्य है ? जानने से मेरा तात्पर्य है, किसी तथ्य को स्वयं द्वारा किये गए प्रेक्षणों, प्रयोगों, विश्लेषण और चिंतन द्वारा किसी वस्तु या घटना और उसके कारणों के विषय में निष्कर्ष निकलना. और वास्तव में यही वास्तविक रूप से "जानना" है. यदि इस दृष्टि से देखा जाए, तो मैं विज्ञान नहीं के बराबर जानता हूँ और बहुत सारे वैज्ञानिक तथ्यों पर केवल विश्वास करता हूँ. यह धार्मिक विश्वास की ही तरह है. (अंध विश्वास नहीं कहना चाहता - कोई भी विश्वास, चाहे वह वैज्ञानिक हो या धार्मिक, तबतक अंधविश्वास नहीं है, जबतक कि उसपर आँख मूँद कर बिना तर्क-वितर्क किये विश्वास न कर लिया जाए.) उदाहरण के लिए, विज्ञान में मैंने पढ़ा था कि परमाणु प्रोटॉनों और इलेक्ट्रानों, इत्यादि से बना होता है. मैंने पढ़ा और विश्वास कर लिया. इसका सत्यापन नहीं किया. परन्तु इसके सत्यापन के लिए विधियाँ हैं, परन्तु इसकी व्यवस्था मेरे विद्यालय में नहीं थी. यह एक सामान्य - सा उदाहरण है. परन्तु विज्ञान में बहुत सारे ऐसे तथ्य हैं, जिनका सत्यापन करना प्रत्येक के लिए संभव नहीं है, क्योंकि वे अत्यंत तकनीकी और खर्चीले हैं और उनके लिए उच्च-स्तरीय ज्ञान आवश्यक है. उदाहरण के लिए, हाल ही में गुरूत्वीय तरंगों की खोज की गई. मेरे पास इसपर विश्वास करने के अतिरिक्त और कोई उपाय नहीं है. मेरे पास ही क्यों, बहुतों के पास नहीं है. यह ज्ञान तो केवल उन्हें ही प्राप्त हुआ होगा, जो इस शोध से जुड़े हुए थे और उनमें भी पूर्ण ज्ञान कुछ उन गिने - चुने वैज्ञानिकों को प्राप्त हुआ होगा, जो इस शोध से नजदीक से जुड़े थे. अतः गुरूत्वीय तरंग से संबंधित मेरी जानकारी मात्र एक वैज्ञानिक विश्वास है. इसे मैं जानना नहीं कह सकता. परन्तु प्रत्येक चीज का स्वयं सत्यापन करने में हम लग जाएँ, तो फिर हम आगे कुछ नहीं सोच पाएँगे, क्योंकि ज्ञान अथाह है. बहुत सारे छात्र और शोधकर्ता भी यही करते हैं. वे कुछ वैज्ञानिक तथ्यों का बिना सत्यापन किये उनपर विश्वास कर आगे का कार्य करते हैं. एकतरफ यह विज्ञान के विकास के लिए आवश्यक है, तो इसका नुकसान यह है कि हमें किसी चीज का पूर्ण ज्ञान नहीं प्राप्त हो पाता है. परन्तु इसका कोई उपाय भी नहीं है, क्योंकि हमारा जीवन सीमित है और प्राप्य ज्ञान अथाह. संक्षेप में, हमें कुछ हद तक "विश्वास" से काम चलाना पड़ता है.

नोट: ये मेरे व्यक्तिगत विचार हैं और इनसे किसी का सहमत या असहमत होना आवश्यक नहीं है.

Friday, December 23, 2016

श्रीगणितम्गीता

रामानुजन - गाथा और गणित चालीसा लिखने के बाद श्रीमद्भगवद्गीता पढ़कर मन में विचार आया - क्यों न श्रीगणितम्गीता लिखा जाए. यह विचार अभी प्रस्तावित है. इसके लिए कुछ संस्कृत शब्दों को सीख रहा हूँ. साथ ही पात्र और प्रसंग के विषय में सोच रहा हूँ. इसके लिए एक प्रसंग का ध्यान कुछ इस प्रकार आया है:
दो अलग - अलग परिवार के लोग (अभी पांडु और कुरु ही मान लीजिए ) अपने - अपने सम्मान की रक्षा के लिए बच्चों (अभी पांडव और कौरव ही मान लीजिए) को गणित पढ़ाना चाहते हैं. बच्चे भी मान जाते हैं. परन्तु विद्यालय पहुँचकर एक बच्चे (अभी अर्जुन ही मान लीजिए) का मन भटक जाता है. तब शिक्षक (अभी कृष्ण ही मान लीजिए) इस प्रकार उपदेश देते हैं:

धृतराष्ट्र उवाच

ज्ञानक्षेत्रे विद्यालये समवेता गणितेच्छवः ।
मामकाः पाण्डवाश्चैव किमकुर्वत संजय ॥

(भावार्थ : धृतराष्ट्र बोले- हे संजय! ज्ञानभूमि विद्यालय के प्रांगन में एकत्रित, गणित पढ़ने की इच्छावाले मेरे और पाण्डु के पुत्रों ने क्या किया ?)

अर्जुन उवाच

बहुविध विज्ञानम् वाणिज्यम् साहित्यस्तथैव च कलाः ।
दर्शनम् राजनीतिशास्त्रश्च किंकिम नास्ति सरस विषयाः॥

(भावार्थ : अर्जुन बोले - विज्ञान, वाणिज्य, साहित्य और कई प्रकार की कलाएँ हैं. दर्शन, राजनीतिशास्त्र और न जाने कौन - कौन से सरस विषय हैं. )

एतान्न हन्तुमिच्छामि घ्नतोऽपि मधुसूदन ।
अपि त्रैलोक्यस्य सुखस्य हेतोः किं नु गणितस्य कृते ॥

(भावार्थ : हे मधुसूदन! मुझे मारने पर भी अथवा तीनों लोकों के सुख के लिए भी मैं इन सब (विषयों को पढ़ने की) इच्छा को मारना नहीं चाहता, फिर गणित के लिए तो कहना ही क्या है?)

संजय उवाच
एवमुक्त्वार्जुनः विद्यालये कक्षोपस्थ उपाविशत्‌ ।
विसृज्य गणितस्य पुस्तकञ्च शोकसंविग्नमानसः ॥

(भावार्थ : संजय बोले- विद्यालय प्रांगन में शोक से उद्विग्न मन वाले अर्जुन इस प्रकार कहकर, गणित के पुस्तक को त्यागकर कक्षा के पिछले भाग में बैठ गए.)

श्रीभगवानुवाच

कुतस्त्वा कश्मलमिदं विषमे समुपस्थितम्‌ ।
अनार्यजुष्टमस्वर्ग्यमकीर्तिकरमर्जुन॥

(भावार्थ : श्रीभगवान बोले- हे अर्जुन! तुझे इस असमय में यह मोह किस हेतु से प्राप्त हुआ? क्योंकि न तो यह श्रेष्ठ पुरुषों द्वारा आचरित है, न स्वर्ग को देने वाला है और न कीर्ति को करने वाला ही है.)

यदा यदा हि गणितस्य ग्लानिर्भवति भारत ।
अभ्युत्थानमगणितस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्‌ ॥

(भावार्थ : हे भारत! जब-जब गणित की हानि और अगणित की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने रूप को रचता हूँ अर्थात साकार रूप से छात्रों के सम्मुख प्रकट होता हूँ)

परित्राणाय गणितज्ञानाम् विनाशाय च दुष्कृताम्‌ ।
गणितसंस्थापनार्थाय (रामानुजनसदृशे) सम्भवामि युगे युगे ॥

(भावार्थ : गणितज्ञों का उद्धार करने के लिए, दुष्टों का विनाश करने के लिए और गणित की अच्छी तरह से स्थापना करने के लिए मैं ही (रामानुजन के रूप में) युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ.)

श्रीभगवानुवाच


तस्मात्त्वमुत्तिष्ठ यशो लभस्व जित्वाज्ञानं पठतु गणितं समृद्धम्‌ ।
मयैवैते प्रमेयाः सिद्धाः अन्वेषिताः पूर्वमेव निमित्तमात्रं भव सव्यसाचिन्‌ ॥

(भावार्थ : अतएव तू उठ! यश प्राप्त कर और अज्ञान को जीतकर समृद्ध गणित पढ़। ये सभी प्रमेय पहले ही से मेरे ही द्वारा खोजे और सिद्ध किए जा चुके हैं. हे सव्यसाचिन ! (बाएँ हाथ से भी कुशलता पूर्वक कार्य कर लेने वाला) तू तो केवल निमित्तमात्र बन जा.)

© राज कुमार मिस्त्री

Friday, September 5, 2014

गुरु के प्रति ......




करते जो ज्ञान दान,
करते जो राष्ट्र निर्माण,
करके छात्र चरित्र निर्माण,
सभी गुरुजनों को मेरा शत शत प्रणाम !

ज्ञान पिपासा शमन करने को,
आप आये बनके गुरु महान |
हम थे जीवन-पथ से अनभिज्ञ,
आपने ही सिखाया लक्ष्य-संधान |

अज्ञानता दूर कर ज्ञान का प्रकाश दिया,
किया चरित्र-निर्माण, दिया उच्च संस्कार |
सिखलाया काँटों पर चलना, तप में तपना ,
आपने ही जीवन में दिखलाया सद् मार्ग |

जब जब हुए हम उत्साहहीन, तेजहीन,
किया आपने ऊर्जासंचार, धैर्य प्रदान |
थे अपनी ही क्षमताओं से अनजान,
किया उसे जागृत, आपकी कृपा महान |

स्वयं ईश्वर भी धरा पर लेकर अवतार,
करके शिष्यत्व ग्रहण आपका, हुए कृतार्थ |
करके विद्यार्जन, हुए ज्ञानी पराक्रमी महान ,
करके आपका यश विस्तार, हुए कृतार्थ |

गुरु भक्ति की महिमा है अपरम्पार,
संतों ने किया आपका गुणगान बारम्बार |
करता है ह्रदय आपका वंदन,
आपके चरणों में सहस्र- सहस्र नमन |

गुरु – शिष्य संबंध के बदलते आयाम



"गुरु ब्रह्मा, गुरुर्विष्णु गुरुर्देवो महेश्वरः।
गुरुः साक्षात परब्रह्म तस्मैः श्री गुरुवेः नमः।"
 
भारतीय संस्कृति में गुरु के उच्च स्थान की झलक मिलती है। यह उपरोक्त श्लोक से ही स्पष्ट है | भारतीय बच्चे प्राचीन काल से ही आचार्य देवो भवः का बोध-वाक्य सुनकर ही बड़े होते हैं। गुरुकुल का विधान भारतीय संस्कृति की अनूठी विशेषता है। सफल जीवन के लिए शिक्षा बहुत उपयोगी है, जो गुरु द्वारा प्रदान की जाती है। गुरु का संबंध केवल शिक्षा से ही नहीं होता, बल्कि वही  उनमें अंतर्निहित शक्तियों को विकसित करने की पृष्ठभूमि तैयार करता है, वही सर्वांगीण विकास के लिए उनका मार्ग प्रशस्त करता है। किताबी ज्ञान के साथ नैतिक मूल्यों व संस्कार रूपी शिक्षा के माध्यम से एक गुरु ही शिष्य में अच्छे चरित्र का निर्माण करता है। 

गुरु-शिष्य परंपरा भारत की संस्कृति का एक अहम और पवित्र हिस्सा है, जिसके कई स्वर्णिम उदाहरण इतिहास में दर्ज हैं। कई ऋषि-मुनियों ने अपने गुरुओं से तपस्या की शिक्षा को पाकर जीवन को सार्थक बनाया। एकलव्य ने द्रोणाचार्य को अपना मानस गुरु मानकर उनकी प्रतिमा को अपने सक्षम रख धनुर्विद्या सीखी। लेकिन वर्तमान समय में यह परंपरा विलुप्त होती जा रही है, जो चिंतनीय है | वर्तमान शिक्षा पद्धति नैतिकता का विकास करने में अक्षम है जो इस परंपरा पर गहरा आघात कर रहा है |  

'शिक्षा' को अब एक व्यापार समझकर बेचा जाने लगा है जो किसी भी बच्चे का एक मौलिक अधिकार है | शिक्षा की आड़ में कई शिक्षक अपने छात्रों का शारीरिक और मानसिक शोषण करने को अपना अधिकार ही मान बैठे हैं। किंतु कुछ ऐसे गुरु भी हैं, जिन्होंने हमेशा समाज के सामने एक अनुकरणीय उदाहरण पेश किया है | शिक्षा ही हमारे मानव जीवन में सद्विचारों को जन्म देती है और ऐसी शिक्षा केवल अच्छे गुरु ही प्रदान कर सकते हैं | प्राचीन समय में शिष्य गुरुकुल में रहकर शिक्षा प्राप्त करते थे। आज यह शिक्षा गुरुकुल से लेकर आलीशान भव्य भवनों में आ गई है। यहां शिक्षा व्यवस्था को संचालित करने वाली प्रबंधन इकाई के रूप में प्रशासन नाम की नई चीज जुड़ने से शिक्षा ने व्यावसायिक रूप धारण कर लिया है। जिसे आधुनिक घटना के रूप में देखा जा सकता है। 

प्राचीन काल में गुरु का कर्तव्य ज्ञान देना और छात्रो का कर्तव्य ज्ञान प्राप्त कर समाज, राष्ट्र और विश्व का कल्याण करना था | परंतु आज शिक्षा अर्थोपार्जन और स्वार्थ-सिद्धि का साधन बन गया है, परिणामतः पवित्र गुरु शिष्य संबंध भी स्वार्थ रूपी विष से विषाक्त हो गया है | परिणामस्वरूप मानव समाज आत्म केंद्रित और स्वार्थ केंद्रित होता जा रहा है। व्यावसायिकता की आंच से मानवीय संवेदनाएं ध्वस्त हो रही हैं और हमारी कथित भाग्य विधाता शिक्षक समाज राष्ट्र में व्याप्त इस भयावह परिस्थिति को निरीह और असहाय प्राणी बनकर मूकदर्शक की भांति देखने को विवश हैं। दुर्भाग्य से हमारे देश में समाज के सर्वाधिक प्रतिष्ठित और आदर प्राप्त "शिक्षक" की हालत अत्यधिक दयनीय और जर्जर कर दी गई है।

पिछले कुछ ही समय में ऐसी कई घटनाएँ देश और दुनिया में घटी है जो हमारे प्राचीन गुरु शिष्य परंपरा को शर्मसार करती हैं | कहा गया है कि विद्या ददाति विनयम् ”, परंतु वर्तमान समय में प्रायः ऐसी विद्या दी जाती है, जो विनयशीलता को जन्म नहीं देती है | छात्रों में नैतिकता की कमी हो रही हैं, जिससे समाज में अनैतिक, स्वार्थी और असंतोषी वृतियों का जन्म होता है और यही अगली पीढ़ियों को भी पतन के गर्त में ले जाता है | यह समझना आज बहुत जरूरी हो गया है कि या तो शिक्षक वो शिक्षक नहीं रहे जो अपने छात्रों को सही संस्कार दे सकें, या हमारे घर के संस्कारों में ही कुछ कमी है, या फिर आजकल के शिक्षकों में अहंकार, अत्याचार, ईर्ष्‍या और द्वेष का भाव बहुत ज्यादा मात्रा में आ गया है | यह सब मैं इसलिए नहीं कह रहा हूँ कि मैं शिक्षकों का आदर करना नहीं जानता

हमारे शिक्षकों को अपनी जिम्मेदारी को निभाना होगा, तभी राष्ट्र के शिक्षार्थी मजबूत हृदय से राष्ट्र को मजबूत करेंगे | और अगर हम छात्र अपने क्रोध, ईर्ष्या को त्याग कर अपने अंदर संयम के बीज बोएँ तो निश्‍चित ही हमारा व्यवहार हमें ऊँचाइयों तक ले जाएगा |  तभी हमारा शिक्षक दिवस मनाने का महत्व भी सार्थक होगा |

(5 सितम्बर 2013 के लेख का पुनर्प्रकाशन)